khushiyan

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

बचपन में सुनती थी 
जब कहानियाँ राक्षसों की 
तो सोचती थी जाने कैसे दिखते होंगे 
बड़ी बड़ी आँखें 
लम्बी जीभ,बड़े बड़े हाथ 
जाने क्या करते होंगे वो लोगों के साथ 
वे कैसे किसी को मारते होंगे 
रुलाते होंगे तडपाते होंगे। 
  धीरे धीरे लगने लगा कि राक्षस बस  कहानियों में होते हैं 
या बस  सपनों में जब बच्चे सोते हैं। 
पर अब समझी राक्षस क्या है,कैसा है 
देखने में तो वो तेरे मेरे जैसा है 
उसकी कोई शक्ल नहीं होती,कोई नाम नहीं होता,
कोई मजहब कोई ईमान नहीं होता। 
अगर राक्षस नहीं होते तो वो कौन हैं 
जो एक मासूम के आंसू पर ठहाके लगते हैं 
जो लगा के आग घरों में पटाखे जलाते हैं 
जिन्हें बूढ़े बच्चों किसी पर दया नहीं आती 
गुडिया की मासूमीयत नोच के भी हया  नहीं आती। 
वो राक्षस नहीं तो कौन हैं.…. 
जो बसों में ट्रेनों में स्कूलों कालेजों में 
अपनी बड़ी बड़ी आँखों से जिस्म घूरा करते हैं 
जो चंद पैसों की लालच को किसी के खून से पूरा करते हैं 
वो राक्षस नहीं तो कौन हैं.… 
ये राक्षस पहले भी थे, अब भी हैं, आगे भी रहेंगे 
जब तक इंसानों के भेष में छिपे हैवानो के 
अत्याचार हम सहते रहेंगे। 
लोग कहते हैं ,द्रोपदी की पुकार पे आने वाला कृष्णा कहाँ  खो गया,
भगवान पत्थर बन कहाँ  सो गया,
पर दोस्तों भगवन न सोया है ,न खोया है 
वो हमारे ही अंदर कहीं  धधक रहा है सिसक रहा है 
जिस इंसान के रूप में वो राक्षसों का संहार करता था 
वो इंसान ही सो गया है 
हाँ दोस्तों,इंसान के अंदर छिपा राक्षस जाग  गया है 
इंसान सो गया है ,इन्सान सो गया है … 


--
pallavi.