khushiyan

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

सयानी लड़कियाँ


कभी सुनी है उन सयानी लड़कियों की सिसकियाँ
जिनके उदाहरण घर की हर बेटी को सुनाए जाते हैं
जिनकी खुशियों की नींव पर
न जाने कितने घर बनाये जाते हैं।
ये तो हमारी रानी बिटिया है,आज तक कोई फरमाइश नहीं की
ठीक उसी पल अपनी पसंदीदा चीज पाने को
बढ़े उसके हाथ रुक जाते हैं
"क्या बेटी पायी हो" से माँ को गर्वित कराती बच्ची के
अपने ही कंधे अच्छा बनने की जिम्मेदारी से झुक जाते हैं।

पड़ोस की एक लड़की के प्रेमी संग भागने पर
जब पूरे मोहल्ले की लड़कियों की पढ़ाई रोकने के फरमान सुनाए जाते हैं
तब यही सयानी बेटियाँ आगे आती हैं
अपनी बहनों,अपनी भतीजियों को और पढ़ाने की जिद लिए
विश्वास दिलाती हैं ये मेरी बहन है
   मुझ सी ही सयानी  रहेगी
 वो गुमनाम खत जिनसे प्रेम की भावनाएँ फलीभूत होती हैं
उन्हें बिना पढ़े ही कूड़ेदान में फेंक देगी।

यही सयानी बेटियाँ अपनी विधवा ननद को
ये यकीन दिलाती हैं कि उनका वैधव्य
उनकी मनहूसियत का परिणाम नहीं है।
जरूरत पड़ने पर अन्नपूर्णा से लक्ष्मी बनी ये बेटियाँ
सर्द रातों में गीले तकिये पे सो जाती हैं ।
और दे देती हैं बीमार 'माँ 'को अपनी खैरियत की सूखी खुशियाँ,
लाचार पिता को आश्वासन कि उनका चुनाव गलत नहीं था।

कुछ रूढ़ियों को बिना आवाज, तोड़ देती हैं
कि आने वाली पीढ़ी  उसका बोझ न उठाये
नहीं आता उन्हें हर बात की शिकायत करना
हर रिश्ते को परख के तराजू पर तौलना
किताबी ज्ञान में अव्वल रहने वाली ये लड़कियाँ
व्यवहारिक ज्ञान में अक्सर कमअक्ल रह जाती हैं।

वो विश्वास होती हैं हर उस घर का जिनकी नींव
इनके समझौतों की ईंट पर टिकी होती है
बेहद मजबूत, बेहद सहनशील ये सयानी लड़कियाँ
   उस वक़्त बिखर जाती हैं
जब इन्हीं की बहन,भाभी,ननद या सहेली  इनके स्वभाव पर 
        स्वार्थ व कुटिलता का आक्षेप लगा जाती हैं।।

पल्लवी विनोद
1/07/2019
धरती ने लिखी थीं कुछ कविताएँ.....

धरती ने लिखी थीं कुछ कविताएँ
प्रेम की हरी स्याही में डूबी
कुछ में अपनी चंचलता  लिखी तो कुछ में विकलता
चंचलता नदियाँ बन गईं,विकलता नमकीन समंदर
कुछ में अपना समर्पण भर
 तरु से भरे जंगल बना दिए
उसकी कसक भरे कुछ पन्ने मरुस्थल में पड़ी रेत बने
 कुछ में आशाओं के  झील सजा दिए
    फूलों के बगीचों में उन कविताओं में छिपा श्रृंगार मुस्कुराता था
फुलवारियों में टपकता था वात्सल्य बच्चों की झोली में
 और बहती हवाओं के साथ उसका प्यार
हर ओर बिखर जाता था।

पर अब .....

उसके पाषाण होते हृदय से नहीं होता कविताओं का सृजन
अनुराग की दूर्वा जमती तो है पर उपेक्षाओं के विराग से पुनः सूख जाती है
शायद अब वो भी थक गयी है एकतरफा प्रेम के ठहराव से।।


पल्लवी विनोद

(धरती की कविताएँ हैं उसका पर्यावरण, जो उसके प्रेम से प्रस्फुटित हुई हैं और अब हमारा प्यार ही उन्हें जिंदा रख पायेगा। "विश्व पर्यावरण दिवस" की आप सबको बधाई ।चलिए धरती से मिला प्रेम लौटाएँ। हम सब नए वृक्ष लगाएं)
बन्द कर दो अपनी  बेटियों को परिकथा सुनाना
मत सुनाओ ऐसी कोई भी कहानी
जिसमें सफेद घोड़े पर बैठा राजकुमार
उसे उसकी सपनों की दुनिया मे ले जाएगा
उनकी किताबों से निकाल दो वो कहानियाँ
जिसमें कोई जादू से उसे राजकुमारी बना देगा।

 कभी मत कहना कि ये घर तुम्हारा नहीं है
मत बोलना कि वो तुम्हारे बुढ़ापे का सहारा नहीं है।
उसे बताना कि तुम फूल नहीं वृक्ष हो
एक मजबूत वृक्ष,जिसे तोड़ना आसान नहीं है
दिला देना गुड़ियों के साथ कुछ कार और बंदूक के खिलौने
कभी न कहना, पेड़ों पर चढ़ना तुम्हारा काम नहीं है।

कहना कि तुम बहुत खूबसूरत हो बेटा
तन से ही नहीं मन से भी
 किसी और की तारीफ के लिए खुद को घण्टों सजाना जरूरी नहीं है
उसे बताना हर किसी को तुम अच्छी ही लगो ऐसी कोई मजबूरी नहीं है।

 बिटिया तुम बिटिया ही रहना
तुम जैसी हो पूर्ण हो
 बेटा बनने की प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं हो
स्त्रीत्व की गरिमा में सम्पूर्ण हो।

बहने देना नदियों की तरह, चिड़ियों सा उड़ने देना
हँसने देना रोने देना, जब सही हो वो,लड़ने देना
बताना कि उसके कपड़े चरित्र नहीं ,
         व्यक्तित्व के परिचायक हैं
हक देना चुनने का उसको
          जो भी उसके लायक हैं।

और एक बात जरूर बताना.....
वो जननी है,उसके जननांग उसकी शक्ति हैं
किसी की बुरी नजर या गलत स्पर्श से उसकी इज्जत कम नहीं होती
बेटियाँ भी बेटों सा ही जीवन जीती हैं
 किसी भी पिता के चौखट की लाज धरम नहीं होती।।

पल्लवी विनोद

मेरुदण्ड

आज फिर से 'मेरुदंड' .....

मेरुदण्ड

बहुत बदल गयी हैं लड़कियाँ आजकल
वो कहते हैं कि बिगड़ गयी हैं लड़कियाँ आजकल
जो कभी धैर्य शील की परिभाषा थी,
मौन ही जिसकी भाषा थी,
वो अब हर बात का जवाब देने लगी है
नहीं रोती बन्द कमरों में किवाड़ लगा कर,
हर उचित अनुचित कृत्य का हिसाब लेने लगी है।

 क्योंकि उसने  देखा है माँ को,
 सुबह से रात तक
ओखली से जाँत तक
कभी पीसते कभी पिसते हुए
दादी की दुर्गंध साफ कर
 बाबा की धोती पर साबुन घिसते हुए
उसने देखा है  तमाचा खा कर भी
हर शादी में बूआ को हँसते हुए
मौसी की सुंदरता पर लोलुप चाचा को
   घटिया तंज कसते हुए
उसने देखा है अपनी उलझे बालों वाली माँ को
चाहे अनचाहे संवरते हुए
अशुद्ध दिनों के दर्द को झेलती
पिता की  झूठन कुतरते हुए ।

वो जानती है कि शील की मूर्ति बनकर भी
उससे उसके हर पल का हिसाब माँगा जाएगा
उसके हर एक कौर पर अहसान लादा जाएगा
दिन भर तो खाली पड़ी रहती हो !
बैठे-बैठे खाती रहती हो!
जाने क्या चमकाती रहती हो!
किसके लिए खुद को सजाती रहती हो!
और न जाने कितनी बातें कितनी सौगातें
जो उसने अपनी माँ,बुआ,चाची, मामी को सहेजते देखा है
जाने कितनी इच्छाओं जाने कितनी उम्मीदों
को झूठे बर्तनों के साथ धोते देखा है।

उसने देखा है कपड़ों से ढके बदन पर भी
जानी-पहचानी नजरों को मचलते हुए
महसूस किया है आशीष देते हाथ को
अपनी पीठ पर फिसलते हुए
उसने देखी है पिता की शर्ट चाचा की पैंट
चमकाती औरतों की एक दुनिया को
उपले पाथती, आँगन लीपती
पल-पल घिसती, दर्द से झुकती गुनिया को।

उसने महसूस की है उन सूनी आखों की तरावट
जब महीनों बुआ को बुलाने कोई न आया था
"बंजर धरती का काम नहीं"  सन्देशा भिजवाया था
धरती बंजर थी या बीज बेकार
यह जानने की एक कोशिश न हुई
वो मनहूस बाँझन बन गयी , जो रही अनछुई
पर अब उसकी अजन्मी बहनों की चीख
सवाल करती है।
अपने सवाल का जवाब माँग कर
आज वो बवाल करती है।
लड़ाका है, पटाखा है , दमदार ठहाका है
ये आजकल की लड़की
सदियों के द्वंद का जयघोष करती पताका है।
वो खुद को जान चुकी है
अहमियत सम्मान की पहचान चुकी है
वर्जित कलपुर्जों को उसने अपनी उंगलियों से खोला है
सुप्त इंद्रियाँ जाग गयी हैं
''नहीं अब और नहीं'' बस यही तो बोला है
और तुम अभी से घबरा गए!
प्रवचनों में बेटी को हीरा बता गए!
लेकिन अब वो कोई खुली तिजोरी और सफेद कपड़ा नहीं है
कि उसपर तुम्हारा दाग लग जायेगा
प्लास्टिक की परत चढ़ा ली है उसने
तुम्हारा कीचड़ उसके सम्मान की धार से
 खुद ब खुद बह जाएगा
वो गुरुर है अपनी अम्मा का
जब चाहे सुना दो वो बकवास लफड़ा नहीं है।।

उन्मुक्त है ,स्वच्छंद है, खुद की सोचती है,उद्दंड है
पर आज भी हो तुम उसी पर आश्रित
हर घर की वो मेरुदंड है
हर घर की वो मेरुदंड है।।

पल्लवी विनोद
४/12/2018
पता है मुझे विज्ञान बहुत अच्छा लगता था लेकिन
नहीं पढ़ सकी तब सह शिक्षा में पढ़ने की अनुमति नहीं थी
माँ कहती थी उन्हें भी पढ़ना बहुत अच्छा लगता था
उनके लिए तो  गाँव के बाहर पढ़ना भी सपना था
पर तुम पढ़ना खूब पढ़ना, जहाँ चाहे वहाँ पढ़ना
यही कहा था जब तुम्हें पहली बार कलेजे से लगाया था

मुझे घुंघुरुओं और तबले की थाप उद्वेलित करते थे
लेकिन मेरा नाचना पापा को पसन्द नहीं था
सुना है माँ की आवाज में सरस्वती का वास था
लेकिन उनकी झनकार घर के बाहर किसी ने नहीं सुनी
तुम गाना डूब के गाना, झूम के नाचना जैसे प्रकृति झूमती है
सावन के आने पर, निर्बाध, निराकार

पता है मैं बहुत तेज दौड़ती थी,
 मास्टर साहब मुझे पी टी उषा कहते थे
लेकिन पाँचवी के बाद नहीं दौड़ सकी,
बड़ी हो गयी थी न
माँ कहती थी जब उनके भाई पेड़ से आम तोड़ के फेंकते
तो वो हर आम कैच कर लेतीं,
मामा बताते थे कि माँ का निशाना पूरे गाँव मे सबसे अच्छा लगता था
पर ये सब तो उन्होंने सात-आठ साल तक ही किया
उसके बाद तो वो चूल्हे की आग पर  बिन जलाए फुलके सेंकना सीखने लगीं
पर तुम खूब खेलना, ये बास्केट बॉल,फुट बॉल, क्रिकेट,स्विमिंग जो मन आये वही खेलना

कुछ इन्हीं वादों के साथ मैंने और तुम्हारे पापा ने तुम्हारा स्वागत किया था
हमारे लिए तुममें और मोनू में कोई फर्क नहीं
जो मोनू के लिए सही वो हर चीज तुम्हारे लिए भी सही

पर.......

 स्तब्ध हूँ कि न तुम्हें पढ़ना अच्छा लगा
न गाना, न नृत्य की बारीकियाँ जानना
न किसी खेल को प्रतियोगिता की तरह खेला
न सपनों के कैनवास पर रंग भरा
मेरी तमाम कोशिशों के बाद  तुम्हें मिली स्वतंत्रता
कब स्वच्छंदता में बदल गयी पता ही नहीं चला

स्वयंसिद्धा बनने की उमर में
 आत्ममुग्धता के दलदल में फंसती जा रही हो
जिस पितृसत्ता से लड़कर खुद को
सिर्फ एक स्त्री देह समझने की नीयत से  आजाद करने की लड़ाई मेरी नानी,मेरी माँ और मैंने लड़ी
आज तुम उसी देह की बेड़ियों में फिर से कैद होती जा रही हो।

पल्लवी विनोद
15/06/2019


हाँ! नहीं हो तुम,
  खूबसूरत कोमलांगी
 श्वेत साड़ी में लिपटी
      भीगती नायिका सी
तुम तो गमक हो सोंधी माटी की
 जिसको महसूस कर रोमांचित हो जाता हूँ मैं।।
औ जब तुम, चीरती हो विकृत भीड़,,कदम बढ़ाकर
तुम्हारी कोमलता का नव रूप देख पाता हूँ मैं।।

हाँ!नहीं हो तुम,
 वक्ष,कमर व नितम्ब के
मानक अनुपातों में बँटी
पर जब मेरी गृहस्थी का गणित
अनुपातों में रख कर जोड़ती हो
मन ही मन अपने भाग पर इतराता हूँ मैं ।।

हाँ!नहीं हो तुम
तीखे नैन, उभरे होठ की
कृत्रिमता में पुती
नायिका सी
पर जब रसोई की गंध ले,
थकी उलझी लटें खोल,हो मुझमें सिमटती
तेरी चंचल आंखों की मादकता में मदहोश हो जाता हूँ मैं।

हाँ!नहीं हो तुम
 किसी फिल्मी माँ सी कमसिन
पर जब सींचती हो
मेरा अंश अपने स्नेह से
स्थूलता भुला इस देह की
 जब उसपर रींझती हो
तेरी मातृ शक्ति के परिचय से सम्मोहित हो जाता हूँ मैं।।

हाँ!नहीं हो तुम
किसी अप्सरा सी
  शोभना सी
  तारिका सी
पर जब - जब तेरे विविध रूप से
टकराता हूँ मैं,
हर रूप के सौंदर्य से सवंर जाता हूँ मैं।।

By Pallavi Vinod

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

बचपन में सुनती थी 
जब कहानियाँ राक्षसों की 
तो सोचती थी जाने कैसे दिखते होंगे 
बड़ी बड़ी आँखें 
लम्बी जीभ,बड़े बड़े हाथ 
जाने क्या करते होंगे वो लोगों के साथ 
वे कैसे किसी को मारते होंगे 
रुलाते होंगे तडपाते होंगे। 
  धीरे धीरे लगने लगा कि राक्षस बस  कहानियों में होते हैं 
या बस  सपनों में जब बच्चे सोते हैं। 
पर अब समझी राक्षस क्या है,कैसा है 
देखने में तो वो तेरे मेरे जैसा है 
उसकी कोई शक्ल नहीं होती,कोई नाम नहीं होता,
कोई मजहब कोई ईमान नहीं होता। 
अगर राक्षस नहीं होते तो वो कौन हैं 
जो एक मासूम के आंसू पर ठहाके लगते हैं 
जो लगा के आग घरों में पटाखे जलाते हैं 
जिन्हें बूढ़े बच्चों किसी पर दया नहीं आती 
गुडिया की मासूमीयत नोच के भी हया  नहीं आती। 
वो राक्षस नहीं तो कौन हैं.…. 
जो बसों में ट्रेनों में स्कूलों कालेजों में 
अपनी बड़ी बड़ी आँखों से जिस्म घूरा करते हैं 
जो चंद पैसों की लालच को किसी के खून से पूरा करते हैं 
वो राक्षस नहीं तो कौन हैं.… 
ये राक्षस पहले भी थे, अब भी हैं, आगे भी रहेंगे 
जब तक इंसानों के भेष में छिपे हैवानो के 
अत्याचार हम सहते रहेंगे। 
लोग कहते हैं ,द्रोपदी की पुकार पे आने वाला कृष्णा कहाँ  खो गया,
भगवान पत्थर बन कहाँ  सो गया,
पर दोस्तों भगवन न सोया है ,न खोया है 
वो हमारे ही अंदर कहीं  धधक रहा है सिसक रहा है 
जिस इंसान के रूप में वो राक्षसों का संहार करता था 
वो इंसान ही सो गया है 
हाँ दोस्तों,इंसान के अंदर छिपा राक्षस जाग  गया है 
इंसान सो गया है ,इन्सान सो गया है … 


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pallavi.