khushiyan

मंगलवार, 2 जुलाई 2019



हाँ! नहीं हो तुम,
  खूबसूरत कोमलांगी
 श्वेत साड़ी में लिपटी
      भीगती नायिका सी
तुम तो गमक हो सोंधी माटी की
 जिसको महसूस कर रोमांचित हो जाता हूँ मैं।।
औ जब तुम, चीरती हो विकृत भीड़,,कदम बढ़ाकर
तुम्हारी कोमलता का नव रूप देख पाता हूँ मैं।।

हाँ!नहीं हो तुम,
 वक्ष,कमर व नितम्ब के
मानक अनुपातों में बँटी
पर जब मेरी गृहस्थी का गणित
अनुपातों में रख कर जोड़ती हो
मन ही मन अपने भाग पर इतराता हूँ मैं ।।

हाँ!नहीं हो तुम
तीखे नैन, उभरे होठ की
कृत्रिमता में पुती
नायिका सी
पर जब रसोई की गंध ले,
थकी उलझी लटें खोल,हो मुझमें सिमटती
तेरी चंचल आंखों की मादकता में मदहोश हो जाता हूँ मैं।

हाँ!नहीं हो तुम
 किसी फिल्मी माँ सी कमसिन
पर जब सींचती हो
मेरा अंश अपने स्नेह से
स्थूलता भुला इस देह की
 जब उसपर रींझती हो
तेरी मातृ शक्ति के परिचय से सम्मोहित हो जाता हूँ मैं।।

हाँ!नहीं हो तुम
किसी अप्सरा सी
  शोभना सी
  तारिका सी
पर जब - जब तेरे विविध रूप से
टकराता हूँ मैं,
हर रूप के सौंदर्य से सवंर जाता हूँ मैं।।

By Pallavi Vinod

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें