धरती ने लिखी थीं कुछ कविताएँ.....
धरती ने लिखी थीं कुछ कविताएँ
प्रेम की हरी स्याही में डूबी
कुछ में अपनी चंचलता लिखी तो कुछ में विकलता
चंचलता नदियाँ बन गईं,विकलता नमकीन समंदर
कुछ में अपना समर्पण भर
तरु से भरे जंगल बना दिए
उसकी कसक भरे कुछ पन्ने मरुस्थल में पड़ी रेत बने
कुछ में आशाओं के झील सजा दिए
फूलों के बगीचों में उन कविताओं में छिपा श्रृंगार मुस्कुराता था
फुलवारियों में टपकता था वात्सल्य बच्चों की झोली में
और बहती हवाओं के साथ उसका प्यार
हर ओर बिखर जाता था।
पर अब .....
उसके पाषाण होते हृदय से नहीं होता कविताओं का सृजन
अनुराग की दूर्वा जमती तो है पर उपेक्षाओं के विराग से पुनः सूख जाती है
शायद अब वो भी थक गयी है एकतरफा प्रेम के ठहराव से।।
पल्लवी विनोद
(धरती की कविताएँ हैं उसका पर्यावरण, जो उसके प्रेम से प्रस्फुटित हुई हैं और अब हमारा प्यार ही उन्हें जिंदा रख पायेगा। "विश्व पर्यावरण दिवस" की आप सबको बधाई ।चलिए धरती से मिला प्रेम लौटाएँ। हम सब नए वृक्ष लगाएं)
धरती ने लिखी थीं कुछ कविताएँ
प्रेम की हरी स्याही में डूबी
कुछ में अपनी चंचलता लिखी तो कुछ में विकलता
चंचलता नदियाँ बन गईं,विकलता नमकीन समंदर
कुछ में अपना समर्पण भर
तरु से भरे जंगल बना दिए
उसकी कसक भरे कुछ पन्ने मरुस्थल में पड़ी रेत बने
कुछ में आशाओं के झील सजा दिए
फूलों के बगीचों में उन कविताओं में छिपा श्रृंगार मुस्कुराता था
फुलवारियों में टपकता था वात्सल्य बच्चों की झोली में
और बहती हवाओं के साथ उसका प्यार
हर ओर बिखर जाता था।
पर अब .....
उसके पाषाण होते हृदय से नहीं होता कविताओं का सृजन
अनुराग की दूर्वा जमती तो है पर उपेक्षाओं के विराग से पुनः सूख जाती है
शायद अब वो भी थक गयी है एकतरफा प्रेम के ठहराव से।।
पल्लवी विनोद
(धरती की कविताएँ हैं उसका पर्यावरण, जो उसके प्रेम से प्रस्फुटित हुई हैं और अब हमारा प्यार ही उन्हें जिंदा रख पायेगा। "विश्व पर्यावरण दिवस" की आप सबको बधाई ।चलिए धरती से मिला प्रेम लौटाएँ। हम सब नए वृक्ष लगाएं)
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