khushiyan

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

पता है मुझे विज्ञान बहुत अच्छा लगता था लेकिन
नहीं पढ़ सकी तब सह शिक्षा में पढ़ने की अनुमति नहीं थी
माँ कहती थी उन्हें भी पढ़ना बहुत अच्छा लगता था
उनके लिए तो  गाँव के बाहर पढ़ना भी सपना था
पर तुम पढ़ना खूब पढ़ना, जहाँ चाहे वहाँ पढ़ना
यही कहा था जब तुम्हें पहली बार कलेजे से लगाया था

मुझे घुंघुरुओं और तबले की थाप उद्वेलित करते थे
लेकिन मेरा नाचना पापा को पसन्द नहीं था
सुना है माँ की आवाज में सरस्वती का वास था
लेकिन उनकी झनकार घर के बाहर किसी ने नहीं सुनी
तुम गाना डूब के गाना, झूम के नाचना जैसे प्रकृति झूमती है
सावन के आने पर, निर्बाध, निराकार

पता है मैं बहुत तेज दौड़ती थी,
 मास्टर साहब मुझे पी टी उषा कहते थे
लेकिन पाँचवी के बाद नहीं दौड़ सकी,
बड़ी हो गयी थी न
माँ कहती थी जब उनके भाई पेड़ से आम तोड़ के फेंकते
तो वो हर आम कैच कर लेतीं,
मामा बताते थे कि माँ का निशाना पूरे गाँव मे सबसे अच्छा लगता था
पर ये सब तो उन्होंने सात-आठ साल तक ही किया
उसके बाद तो वो चूल्हे की आग पर  बिन जलाए फुलके सेंकना सीखने लगीं
पर तुम खूब खेलना, ये बास्केट बॉल,फुट बॉल, क्रिकेट,स्विमिंग जो मन आये वही खेलना

कुछ इन्हीं वादों के साथ मैंने और तुम्हारे पापा ने तुम्हारा स्वागत किया था
हमारे लिए तुममें और मोनू में कोई फर्क नहीं
जो मोनू के लिए सही वो हर चीज तुम्हारे लिए भी सही

पर.......

 स्तब्ध हूँ कि न तुम्हें पढ़ना अच्छा लगा
न गाना, न नृत्य की बारीकियाँ जानना
न किसी खेल को प्रतियोगिता की तरह खेला
न सपनों के कैनवास पर रंग भरा
मेरी तमाम कोशिशों के बाद  तुम्हें मिली स्वतंत्रता
कब स्वच्छंदता में बदल गयी पता ही नहीं चला

स्वयंसिद्धा बनने की उमर में
 आत्ममुग्धता के दलदल में फंसती जा रही हो
जिस पितृसत्ता से लड़कर खुद को
सिर्फ एक स्त्री देह समझने की नीयत से  आजाद करने की लड़ाई मेरी नानी,मेरी माँ और मैंने लड़ी
आज तुम उसी देह की बेड़ियों में फिर से कैद होती जा रही हो।

पल्लवी विनोद
15/06/2019

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